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- आज एक पुरानी ग़ज़ल . जाने क्या सोचकर हमने दुनिया छोड़ दी। काँटे बटोरते रहे और कलियाँ छोड़ दी। . मोहब्बत में तुमसे एक कदम आगे ही रहे। तुमने घर छोड़ा तो हमने गलियाँ छोड़ दी। . हर वो शख्स झुलसा हुआ मिला मुझे यहाँ। जिसने जंगल समझकर तहज़ीबों की बगिया छोड़ दी। . दूध के क़र्ज़ को कुछ ऐसा चुकाया उसने। खुद महल में रहा सड़क पर दुखिया छोड़ दी। . अपनों ने ही उस लड़की को ज़िंदा जला दिया। जिसने उनके लिए घर माँ बाप सखियाँ छोड़ दी। . लो सुनो वो तुम्हे बेवफा कहती हैं "अनजाना"। जिस चेहरे की खातिर तुमने कई परियाँ छोड़ दी।
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